कांग्रेस के 141 वें स्थापना दिवस पर 28 दिसंबर को देश भर में कांग्रेस कार्यालयों पर पार्टी के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों द्वारा ध्वजारोहण किया गया। अपनी पार्टी की स्थापना को याद करने और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में खुद को खोजने पहचानने की कोशिश में कांग्रेस जन दिखाई दिए।
140 साल पुरानी पार्टी के इस महत्वपूर्ण दिन पर नजर डालने पर साफ साफ दिखाई देने लगता है कि एक समय पूरे देश में एक विचारधारा में विश्वास की अलख जगाने वाली कांग्रेस आज अपने खो रहे जनाधार में फिर से हौसला और विश्वास भरने के प्रयासों में लगी है।
पार्टी मुख्यालय इंदिरा भवन दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा दिया गया संदेश ‘कांग्रेस एक विचारधारा है और विचारधारा कभी मरती नहीं है’ वर्तमान समय की बदली हुई स्थितियों में कितना सार्थक होगा यह कांग्रेस द्वारा घोषित ‘मनरेगा ‘ बचाने के लिए नए वर्ष 2026 में किये जाने वाले आंदोलन में स्पष्ट हो जायेगा। कांग्रेस के नायकों को याद करते हुए अध्यक्ष ने यह संदेश भी देने की कोशिश की है कि कांग्रेस की ‘विरासत’ कितनी सशक्त है।
मौलिक अधिकारों का स्वरूप जो 1931 में कांग्रेस ने बनाया था वो ही भारत के संविधान का हिस्सा है लेकिन आज संविधान और लोकतंत्र खतरे में है यह भी मल्लिका अर्जुन खड़गे ने याद दिलाया। राष्ट्रीय संसाधनों जल जंगल जमीन पर वर्तमान में जो खतरा मंडरा रहा है उसको इंगित करते हुए कांग्रेस के नैतिकता के आदर्शों का पालन करने और राष्ट्रीय संसाधनों के संरक्षण करने की प्रतिबद्धता को दोहराया। चंद पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने की भाजपा नीति को भी राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कटघरे में खड़ा किया।
लेकिन धरातल पर तस्वीर बिल्कुल बदली हुई है। कांग्रेस की विचारधारा और नीतियों के प्रति विश्वास में बड़ी कमी जिला स्तर तक साफ दिखाई दे रही है। कई गहन कारणों के साथ साथ नेतृत्व के प्रति विश्वास बना पाने में पूरी तरह विफलता के लिए स्थानीय और प्रदेशिक नेताओं के राजनितिक स्वार्थ और महत्वकांक्षा की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। क्षीण हो चुके संगठन में राजनीतिकि प्रतिस्पर्धा से उपजी गुटबाजी ने पार्टी को गहरी क्षति पहुंचने में कोई कसर नहीं छोड़ी और अब भी निरंतर जारी है।
2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव इसका जीता जगता सबूत रहा है। 2020 में मध्यप्रदेश में कंग्रेस के 22 विधायक इसी राजनितिक महत्वाकांक्षा और स्वार्थ के चलते ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ अलग गुट बना कर भाजपा के साथ चले गए और कांग्रेस की सरकार को गिरा दिया।
हरियाणा में कांग्रेस को 2024 के लोकसभा चुनावों में 10 में से 5 सीट हासिल हुईं। उस सफलता को विधानसभा चुनावों में प्रदेश की जनता के व्यापक समर्थन के बावजूद जीत की मजबूत संभावनाओं के होते हुए भी महत्वाकांक्षा की भट्टी में झोंक देने से नहीं चूके।
11 साल बाद प्रदेश में संगठन बन जाने के बावजूद पुरानी छाया का अक्स आज जिला कार्यालयों में साफ दिखाई दिया। कांग्रेस के स्थापना दिवस पर जहाँ जिला स्तर पर कार्यकर्ताओं और समर्थकों की बड़ी गिनती होने की अपेक्षा राष्ट्रीय स्तर की पार्टी से की जाती है। वहां प्रदेश के 22 जिलों में से अधिकतर में उपस्थिति निराशाजनक रही। प्रदेश के बड़े नेताओं की आपसी गुटबाजी ने कार्यकर्ताओं और समर्थंकों को किस कदर निराश किया हुआ है यह अलग अलग जिलों में हुई सभाओं की जानकारियों से मिलता है।
पश्चिमी हरियाणा में सिरसा में जिला अध्यक्ष सहित बामुश्किल 50 लोग ही कार्यक्रम में पहुँच पाए। सिरसा से कांग्रेस सांसद किसी अन्य कार्यक्रम में बाहर प्रवास पर रहीं । सिरसा लोकसभा के अंतर्गत 9 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। कांग्रेस ने 2024 में 6 सीटों पर विजय हासिल की थी। फतेहाबाद में भी हालत कुछ अच्छे नहीं बताए गए।
हिसार में तुलनात्मक रूप से संख्या 200 -250 तक पहुंची जरूर लेकिन हुड्डा गुट के कांग्रेसियों और शहरी जिला अध्यक्ष की दूरी बनी रही। हिसार लोकसभा से जीते हुए सांसद हालांकि शहर के ही विश्रामगृह में थे लेकिन पार्टी कार्यालय में ध्वजारोहण कार्यक्रम में पहुंचे नहीं। हिसार लोक सभा में 9 विधानसभा है जिनमे से कांग्रेस के 3 विधायक हैं। तीनों विधायक हुड्डा गुट से हैं।
दक्षिण हरियाणा में महेन्दरगढ़ लोकसभा के अंतर्गत जिला कार्यालय नारनौल में कर्यक्रम आयोजित किया गया। पूर्व विधायक अनित यादव और वर्तमान विधायक मंजू चौधरी तक ने कार्यक्रम से दूरी बनाये रखी। क्षेत्र के बड़े नेताओं जिनमें पूर्व विधायक शामिल हैं ने भी कार्यक्रम में भागीदारी नहीं की। नए बने जिला अध्यक्ष ने अपने प्रयासों से ही कुछ कार्यकर्ताओं को एकत्रित करके किसी तरह पार्टी का सम्मान बचाया। गुटबाजी की छाया का प्रभाव साफ तौर पर कार्यक्रम पर दिखाई दिया।
भिवानी जिला में ध्वजारोहण शहरी जिला अध्यक्ष और ग्रामीण जिला अध्यक्ष ने अलग अलग किया। उनके कार्यक्रमों में गिनती के ही लोगों की उपस्थिति रही। केवल रस्म अदायगी तक ही कार्यक्रम सीमित रहा।
लगभग ऐसी ही स्थितियां अन्य जिलों में भी रही। पूरे प्रदेश में पार्टी में गुटबाजी का विभाजन स्पष्ट तौर पर ऐसे महत्वपूर्ण दिन पर देखा गया। पार्टी में गुटबाजी का यह अभिशाप व्यक्तिगत राजनीतिक स्वार्थ और महत्वाकांक्षाओं का सबूत है। पार्टी में मौकापरस्तों की तुलना में पार्टी के प्रति समर्पित वफादार सिपाहियों की तादाद लगभग नगण्य हो गयी है। नए बने जिला अध्यक्षों को पुराने मंजे हुए कांग्रेसी स्वीकार करने से कतरा रहे है।
अपने अपने प्रभाव को संरक्षित करने के लिए पार्टी के महत्वपूर्ण कार्यक्रम से खिलवाड़ करके किस प्रकार जनता का विश्वास पार्टी की नीतियों और सिद्धांतों के लिए बना पाएंगे यह सवाल भी अब कांग्रेस के लिए गंभीर हो गया है। लोकतंत्र में एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने के दायित्व में कांग्रेस किस तरह मात खा रही रही है यह उसका उत्कृष्ट उदाहरण भी है।
गंभीर चुनौतियों से जूझती हुई कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल पार्टी के प्रति निष्ठावान योग्य और वफादार कार्यकर्ताओं की पहचान करके उसको जिम्मेदारी देने के साथ साथ मनोबल को बढ़ने और सबसे पहले उनमें विश्वास को मजबूत करने का है।
(जगदीप सिंह सिंधु पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)